देहरादून अर्बन कोऑपरेटिव बैंक (डीयूसीबी) में करोड़ों के कथित घपले के खुलासे को फॉरेंसिक ऑडिट होगा। भारतीय रिजर्व बैंक और अर्बन कोऑपरेटिव बैंक ने बुधवार को यह फैसला लिया। दून अर्बन कोऑपरेटिव बैंक के लेन-देन पर आरबीआई ने रोक लगा दी है। इससे करीब नौ हजार ग्राहकों के 124 करोड़ रुपये फंसने के दावे किए गए। इसे लेकर खाताधारकों के हंगामा करने के बाद बैंक का फॉरेंसिक ऑडिट कराने का निर्णय लिया गया। यूसीबी के सचिव बलबीर सिंह ने बताया कि यह जांच साधारण ऑडिट से अलग होगी।
फॉरेंसिक ऑडिट में आरबीआई से चयनित सीए या अन्य सक्षम अधिकारी जांच करेंगे। ऑडिट करने वाली टीम बैंक के 2014 से 2025 तक के लेनदेन समेत कई बिंदुओं पर जांच करेगी। इसमें घोटाला या हेराफेरी (मनी ट्रेल) की आशंका शामिल है। इसमें जांच की जाएगी कि बैंक में पैसा कहां से आया और कहां गया। लोन लेने वाले लोगों ने कौन से दस्तावेज जमा कराए थे। वे दस्तावेज असली थे या नकली। बैंक में पब्लिक फंड का कस्टोडियन, बैंक मैनेजर होता है। बैंक मैनेजर से विस्तृत जानकारी और दस्तावेज लिए जाएंगे। जांच की जाएगी कि बैंक मैनेजर ने किन लोगों को लोन दिया और गड़बड़ी रोकने के लिए क्या जिम्मेदारी निभाई।
दून अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में नौ हजार उपभोक्ताओं के साथ ही शहर के नामी स्कूल, नगर निगम के ए ग्रेड के ठेकेदारों, बिल्डरों की रकम फंस गई है। सिस्टम की चूक से नौ हजार खाताधारकों को आर्थिक चोट लगी है। शासन-प्रशासन, सहकारिकता विभाग और अफसरों ने संजीदगी नहीं दिखाई। नतीजा यह है कि शेयर होल्डर को भतीजे की शादी के लिए बैंक से दो लाख रुपये निकालने थे लेकिन वह नहीं निकाल पा रहे हैं। ठेकेदारों की पेमेंट फंसने से शहर के विकास कार्यों पर असर पड़ सकता है। नगर निगम के ठेकेदार 30 करोड़ रुपये बैंक में फंसने से सरकारी काम को समय से पूरा करने को लेकर टेंशन में है। दून अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक में 2014 से घपलेबाजी उजागर हुई थी।
इस मामले में आरबीआई के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरबीआई की ओर से बैंकों में ऑडिट कराने का प्रावधान है, ऐसे में यह घपला पकड़ में नहीं आया। शेयर होल्डर आरबीआई से जानकारी मांग रहे थे लेकिन वह नहीं मिली। शासन में भी शिकायतें की गईं लेकिन मामले में कुछ नहीं हुआ।
