दरअसल, बीती 14 अक्टूबर 2015 को एक शासनादेश जारी किया गया था, शासनादेश के मुताबिक, निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों की फीस को बढ़ाकर 80 हजार से 2.15 लाख रुपए कर दिया गया था. जिसे 2013-14 सत्र से ही लागू माना गया था. इस शासनादेश को बीएमएस के छात्र ललित तिवारी समेत अन्य ने नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. जिसमें कहा था कि सरकार को साल 2006 में बने अधिनियम के मुताबिक, शुल्क वृद्धि का अधिकार नहीं है. यह अधिकार फीस निर्धारण नियामक समिति को है. इस आधार पर एकलपीठ ने 9 जुलाई 2018 को शासनादेश को रद्द कर दिया था.
एकलपीठ के इस आदेश को हिमालयन मेडिकल कॉलेज देहरादून और आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के संगठन ‘एसोसिएशन ऑफ कंबाइंड एंट्रेंस एग्जाम’ ने डिवीजनल पीठ में चुनौती दी. खंडपीठ ने भी यह अपील 9 अक्टूबर 2018 को खारिज कर दी. जिसके खिलाफ इनकी ओर से पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी. जिसे 21 नवंबर 2020 को खंडपीठ ने याचिका को दोबारे सुनने के लिए मंजूर किया, फिर एकलपीठ ने साल 2018 में पारित आदेश पर ही रोक लगा दी.
आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों को बीएमएस के छात्रों को लौटाना होगा बढ़ाकर लिया गया शुल्क: यह रिव्यू अपील बुधवार यानी 3 सितंबर 2025 को सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ में पेश हुई. याचिका की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने एकलपीठ की ओर से साल 2018 में पारित आदेश को सही ठहराया है और राज्य के आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों को बीएमएस के छात्र-छात्राओं से लिए गए बढ़े हुए शुल्क को वापस करने के निर्देश दिए हैं. यह शुल्क करोड़ों रुपए में है.
अकेले पतजंलि आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज ने पूर्व में कोर्ट में शपथ पत्र देकर 21 करोड़ रुपए लौटाए जाने की जानकारी दी थी. उत्तराखंड में कुल 12 आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज हैं. बता दें कि यह शुल्क 2018 तक ही लागू था. साल 2019 में हाईकोर्ट के निर्देश पर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य व प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा (सदस्य) के रूप में गठित फीस निर्धारण कमेटी ने फीस निर्धारण कर दिया था, जो 2019 के बाद लागू है.
